अरावली संरक्षण: केंद्र सरकार का दावा और खनन विवाद का विश्लेषण

अरावली क्षेत्र में बढ़ता खनन विवाद और केंद्र सरकार की संरक्षण योजनाएं। क्या विकास की वेदी पर चढ़ रही है अरावली? पढ़िए खनन के सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव और अरावली को बचाने के लिए उठाये गए कानूनी कदमों का निष्पक्ष विश्लेषण।

अरावली संरक्षण: केंद्र सरकार का दावा और खनन विवाद का विश्लेषण
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अरावली संरक्षण: केंद्र सरकार का दावा और खनन विवाद का विश्लेषण

प्रस्तावना

अरावली पर्वतमाला, जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली हुई है, न केवल भारत की बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। हाल ही में, केंद्र सरकार ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पारिस्थितिक गिरावट के आरोपों को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। सरकार के अनुसार, अरावली क्षेत्र का 90% से अधिक हिस्सा सुरक्षित है और वहां किसी भी प्रकार की अनधिकृत गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही है। यह बयान उन याचिकाओं और चिंताओं के जवाब में आया है जिनमें दावा किया गया था कि खनन माफिया इस 'दिल्ली की लाइफलाइन' को खत्म कर रहे हैं।

केंद्र सरकार का पक्ष: '90% हिस्सा सुरक्षित'

संसद और विभिन्न न्यायिक मंचों पर केंद्र ने स्पष्ट किया है कि अरावली का एक बड़ा हिस्सा वन संरक्षण अधिनियम और विभिन्न राज्य कानूनों के तहत सुरक्षित है। सरकार के तर्क के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

सैटेलाइट निगरानी: सरकार का कहना है कि 'भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस एप्लीकेशंस एंड जियो-इंफॉर्मेटिक्स' (BISAG-N) के माध्यम से अरावली के चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है।

राज्यों की सक्रियता: राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात सरकारों के साथ मिलकर एक 'ग्रीन वॉल' परियोजना पर काम किया जा रहा है, जिससे मरुस्थलीकरण को रोका जा सके।

कानूनी सुरक्षा: सरकार के अनुसार, अरावली के अधिकांश हिस्से को 'संरक्षित वन' (Protected Forest) या 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र' (ESZ) घोषित किया गया है, जहाँ खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।

खनन के दबाव का आरोप और वास्तविकता

पर्यावरणविदों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समितियों ने बार-बार चेतावनी दी है कि अरावली के कई पहाड़ गायब हो चुके हैं। आरोप है कि:

अवैध पत्थर खनन: हरियाणा और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में निर्माण कार्यों के लिए पत्थर का अवैध उत्खनन जारी है।

शहरीकरण का दबाव: गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों के विस्तार के कारण अरावली की पहाड़ियों को काटकर रिहायशी सोसायटियां बनाई जा रही हैं।

जल स्तर में गिरावट: अरावली की पहाड़ियां भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का मुख्य स्रोत हैं। खनन के कारण प्राकृतिक जल मार्ग अवरुद्ध हो रहे हैं।

सरकार ने इन आरोपों पर स्पष्ट किया है कि जो खनन हो रहा है, वह निर्धारित 'लीगल माइनिंग जोन' में है और उससे मिलने वाले राजस्व का उपयोग पर्यावरण बहाली के लिए किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

केंद्र के दावों के बावजूद, न्यायपालिका ने हमेशा अरावली के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि "पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं हो सकता।" कोर्ट ने हरियाणा सरकार को 'कांत एंक्लेव' जैसे निर्माणों को गिराने का आदेश दिया था और अरावली में किसी भी प्रकार के गैर-वानिकी कार्यों पर रोक लगा रखी है।

आगे की राह: क्या केवल दावा पर्याप्त है?

  • सिर्फ यह कहना कि 90% हिस्सा सुरक्षित है, समस्या का समाधान नहीं है। भविष्य के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं:
  • डिजिटल सीमांकन: अरावली की सीमाओं का सटीक डिजिटल मैपिंग होना चाहिए ताकि एक इंच जमीन पर भी अतिक्रमण न हो सके।
  • स्थानीय भागीदारी: पहाड़ों के पास रहने वाले समुदायों को 'ईको-टूरिज्म' से जोड़ना चाहिए ताकि वे स्वयं वन रक्षक बनें।
  • कठोर दंड: अवैध खनन में लिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों और माफियाओं पर भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान सख्ती से लागू हो।

निष्कर्ष

केंद्र सरकार द्वारा अरावली के 90% हिस्से को सुरक्षित बताना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन धरातल पर चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। अरावली का अस्तित्व दिल्ली-NCR और उत्तर भारत के भविष्य से जुड़ा है। यदि हम आज इन पहाड़ियों को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को धूल भरे अंधड़ और जल संकट का सामना करना पड़ेगा। विकास और पर्यावरण के बीच का संतुलन ही 'सतत विकास' (Sustainable Development) की असली कुंजी है।