अरावली या रेगिस्तान? दिल्ली पर मंडराता खतरा।

क्या अरावली के बिना दिल्ली रेगिस्तान बन जाएगी? जानिए 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों का विवाद और दिल्ली-NCR पर मंडराते जल संकट व धूल भरी आंधियों का सच।

अरावली या रेगिस्तान? दिल्ली पर मंडराता खतरा।

अरावली या रेगिस्तान? दिल्ली पर मंडराता अस्तित्व का खतरा

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक 'अरावली' आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। हाल ही में पहाड़ियों की परिभाषा और "100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों" को वन संरक्षण के दायरे से बाहर रखने की चर्चाओं ने पर्यावरणविदों और दिल्ली-NCR के निवासियों के बीच एक डर पैदा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हम विकास की अंधी दौड़ में दिल्ली को रेगिस्तान बनाने की ओर बढ़ रहे हैं?

अरावली: दिल्ली की प्राकृतिक ढाल

अरावली केवल पत्थर और मिट्टी के ढेर नहीं हैं; यह उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है। दिल्ली और आसपास के इलाकों के लिए अरावली तीन मुख्य भूमिकाएं निभाती है:

रेगिस्तान के खिलाफ दीवार: अरावली थार रेगिस्तान की रेतीली हवाओं को दिल्ली और गंगा के मैदानों में आने से रोकती है। यह एक 'नेचुरल बैरियर' है।

वॉटर रिचार्ज जोन: हरियाणा और दिल्ली के गिरते भूजल स्तर को बचाने का एकमात्र जरिया ये पहाड़ियां ही हैं। ये वर्षा जल को जमीन के नीचे भेजने का काम करती हैं।

ऑक्सीजन चैंबर: प्रदूषण से जूझती दिल्ली के लिए अरावली के जंगल 'फेफड़ों' की तरह काम करते हैं।

100 मीटर का विवाद क्या है?

विवाद की जड़ में वह प्रस्ताव है जिसमें कहा गया है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली छोटी पहाड़ियों या टीलों को 'वन' या 'संरक्षित क्षेत्र' की श्रेणी से बाहर रखा जा सकता है।

तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे के निर्माण में आसानी होगी। लेकिन पर्यावरणविदों का तर्क है कि अरावली की बनावट ही ऐसी है कि इसकी कई महत्वपूर्ण पहाड़ियां और 'बुलंदियां' 100 मीटर से कम हैं। अगर इन्हें संरक्षण से बाहर किया गया, तो खनन माफिया और रियल एस्टेट बिल्डर इन्हें पूरी तरह समतल कर देंगे।

क्या रेगिस्तान बन जाएगी दिल्ली?

यह कोई काल्पनिक डर नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक चेतावनी है। अरावली में पहले से ही कई 'गैप' (दरारें) आ चुके हैं। हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और राजस्थान के कुछ हिस्सों में पहाड़ियों के गायब होने से रेगिस्तान का विस्तार (Desertification) शुरू हो चुका है।

धूल भरी आंधियां: अगर अरावली की यह 'ग्रेट ग्रीन वॉल' टूटती है, तो राजस्थान की रेत सीधे दिल्ली के घरों में घुसेगी।

तापमान में वृद्धि: पहाड़ और हरियाली तापमान को नियंत्रित करते हैं। इनके बिना दिल्ली की गर्मी 50 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर सकती है।

जल संकट: अरावली के बिना दिल्ली-NCR का वाटर टेबल रिचार्ज नहीं होगा, जिससे आने वाले सालों में पीने के पानी का भयंकर अकाल पड़ सकता है।

'ग्रेट ग्रीन वॉल' का सपना और हकीकत

भारत सरकार ने अफ्रीका की तर्ज पर पोरबंदर से पानीपत तक 'अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' शुरू करने की बात कही थी। इसका उद्देश्य 1400 किमी लंबी हरियाली की पट्टी बनाना था। लेकिन एक तरफ हरियाली बढ़ाने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ पहाड़ियों को 'गैर-वन' घोषित करने की कोशिशें विरोधाभासी लगती हैं।

विवाद का केंद्र: विकास बनाम विनाश

अरावली के आसपास का इलाका रियल एस्टेट के लिए सोने की खान है। गुरुग्राम और फरीदाबाद का विस्तार इन पहाड़ियों की कीमत पर हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अरावली में अवैध खनन पर कड़ी टिप्पणी की है और कहा है कि "पहाड़ियों को गायब होते नहीं देखा जा सकता।" इसके बावजूद, नियमों में ढील देने की कोशिशें पारिस्थितिक तंत्र के लिए आत्मघाती साबित हो सकती हैं।

निष्कर्ष

अरावली को बचाना अब केवल पर्यावरण प्रेम का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह दिल्ली-NCR के करोड़ों लोगों के 'सर्वाइवल' का सवाल है। 100 मीटर की ऊंचाई का पैमाना वैज्ञानिक रूप से गलत है, क्योंकि जैव विविधता (Biodiversity) ऊंचाई देखकर नहीं पनपती।

यदि आज हमने अरावली की इन छोटी पहाड़ियों को खो दिया, तो कल दिल्ली को रेगिस्तान बनने से कोई 'ग्रेट ग्रीन वॉल' नहीं बचा पाएगी। हमें समझना होगा कि कंक्रीट के जंगल कभी प्राकृतिक जंगलों की जगह नहीं ले सकते।

मुख्य सुझाव:

पहाड़ियों को ऊंचाई के बजाय उनके 'पारिस्थितिक मूल्य' (Ecological Value) के आधार पर संरक्षित किया जाए।

अरावली में अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे और पहले से नष्ट हो चुके क्षेत्रों में सघन वनीकरण (Afforestation) हो।